दीक्षायुग प्रवर्तक जैनशासन शिरताज तपागच्छाधिराज परमपूज्य आचार्यदेव श्रीमद् विजय रामचन्द्र सूरीश्वरजी महाराजा ।

गुजरात के पादरा गांव से प्रारंभ हुई आपकी जीवन यात्रा अहमदाबाद में समाप्त हुई थी । जन्म होते ही पिता की छत्रछाया का अभाव होना एवं सात वर्ष की उम्र होते ही माता का देहावसान होना अप्रासंगिक था । तथापि आपका संस्करण आपके पडदादी के ममतामय स्वभाव के चलते उत्तम था । संसारी अवस्था में ‘सबुडा’ के नाम से प्रसिद्ध आपका पूरा नाम त्रिभुवनपाल छोटालाल शाह था । आपकी दीक्षा काफी कठिनाई से हुई थी , और उसी समय आपने दीक्षा धर्म के संरक्षण का संकल्प लिया था । आपके संकल्प के बदौलत ही आज सैंकड़ों संख्या में श्रमण-श्रमणी के दर्शन हो रहे है एवं दीक्षाएं हो रही है । मुनि श्री प्रेमविजयजी म.को गुरुपद पर स्थापन करने के पश्चात गुरु - आदेश एवं गुरुकृपा से आपकी प्रवचन श्रृंखला का प्रारंभ हुआ था , जो नौ दशक तक अविछिन्न रहा । जीवन-काल के दौरान आपका प्रत्येक आचार - विचार - व्यहवार का केंद्र बिन्दु ‘सम्यग्दर्शन’ था। सम्यग्दर्शन का पर्यायवाची शब्द है ‘समकित` । आपके शुभ आलंबन से लाखों की संख्या में जन समुदाय ने समकित प्राप्त किया है । इसी वजह से ‘ समकित दायक ‘ के स्वरूप में आप जन-मन में सम्मानित थे एवं आज भी है । आइए , निहारते है ‘ समकित दायक ‘ महापुरुष के जीवन-यात्रा की उल्लेखनीय झांकियों को ….