३. दीक्षा हेतु प्रतिज्ञा
पांच वर्ष की उम्र में पादरा के गुजराती स्कूल में अध्ययन प्रारंभ कर तेरह वर्ष की उम्र में सातवीं तक गुजराती तथा आठवीं का अंग्रेजी में अध्ययन पूरा कर स्कूल छोड़ दिया।
व्यावहारिक पढ़ाई के साथ-साथ उसने पांच प्रतिक्रमण, प्रकरण, भाष्य, कर्मग्रंथ, स्तवन, सज्झाय आदि का धार्मिक अध्ययन नौ वर्ष की उम्र तक पूरा कर लिया और आगे का धार्मिक अध्ययन चालू रखा।
छः वर्ष की उम्र में दादीमां रतन बा के धर्मसंस्कारों से संस्कारित बने त्रिभुवन ने जब तक संयम ग्रहण न करें तब तक घेवर के त्याग की प्रतिज्ञा साध्वीजी श्री आणंदश्रीजी महाराज के पास ली।
रतन बा समझती थीं की त्रिभुवन का जन्म ही संयम के लिए हुआ है। इसलिए वे समय-समय पर उसे संयम संस्कार देती रहीं, तथापि वे प्रपौत्रमोह के अधीन होकर यह बात उसे जरूर बताती कि बेटा! तुम्हें दीक्षा जरूर लेनी है, किन्तु मेरी मृत्यु के पश्चात्।
मात्र नौ वर्ष की उम्र से गरम पानी पीने तथा बारह वर्ष की उम्र से उपाश्रय में नियमित जाने एवं वहां रात्रि में सोने जैसे नियम का पालन करने वाले त्रिभुवन ने एक बार घर से भागकर श्री नीतिविजयजी दादा के प्रशिष्य श्री चन्दनविजयजी के पास दीक्षा लेने का प्रयत्न किया था, लेकिन रिश्तेदारों को इस बारे में सूचना मिलने पर भी उसको वहां से वापस घर ले आये।
इस घटना के बाद त्रिभुवन को संयम भावना से विचलित करने के भरसक प्रयास किये गये।
पिताजी के चाचा ने कहा- त्रिभुवन! हमारी सारी सम्पत्ति, व्यापार सभी तुम्हारे नाम हम करने को तैयार हैं, बशर्ते तुम दीक्षा का विचार मन से निकाल दो। तब भी त्रिभुवन का जवाब था- आप सभी का धर्म की पेढ़ी चलाने से मना कर मुझे कर्म बंधन की पेढ़ी चलाने के लिए मजबूर करने का क्या तात्पर्य है, यह मेरी समझ से परे है।