१२. कठीन परिश्रम से प्राप्त हुई दीक्षा
श्री मंगलविजयजी महाराज पू. उपाध्यायजी महाराज के पास आये। उन्होंने कहा कि यदि आप आज्ञा दें तो गंधार तीर्थ में जाकर दीक्षा विधि पूरी करने की मुझमें हिम्मत है। आमोद से गंधार १४ मील दूर है। पौष सुदि १३ के लिए कुछ ही घंटे बाकी थे। पू. उपाध्यायजी महाराज की अनुमति मिलते ही श्री मंगलविजयजी महाराज तथा पद्मविजयजी महाराज के साथ उसी दिन शाम को ७ मील विहार कर त्रिभुवन टंकारीया गांव पहुंचा। वहां से पौष सुदि तेरस के दिन प्रातः सात मील का विहार कर सभी गंधार पहुंचे। दो मुनिवर, पेढ़ी के मुनीमजी, पुजारी तथा उपधी लेकर बड़ौदा से आया कोठारी परिवार का एक सदस्य। इतनी छोटी-सी उपस्थिति में सैकड़ों का दीक्षादाता बनने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले त्रिभुवन की दीक्षा विधि का प्रारंभ हुआ।
मंदिर का रंगमंडप, समुद्र किनारा, लहराते पवन के झोंके, ऐसे रमणीय वातावरण में दीक्षा विधि चलने लगी। चारों ओर प्रकाशमान दीपक पवन के झोंके से शायद बुझ न जाये ऐसे भय के बीच भी दीक्षा विधि अपने चरम पर थी। वहां पर कोई हजाम न होने से पास के गांव से हजाम को लाने के लिए एक व्यक्ति को मुनीम ने भेजा। लेकिन वो आये उसके पहले ही मुंडन क्रिया शुरू करनी आवश्यक हो गई थी, क्योंकि मुहूर्त का समय हो गया था। इसलिए श्री मंगलविजयजी महाराज स्वयं त्रिभुवन का मुंडन करने लगे। थोड़े समय में ही हजाम आ गया। उसने मुंडन विधि पूरी की और दीक्षा की क्रिया आगे बढ़ी। टिमटिमाते दीपक पवन से टक्कर लेते आखिर तक प्रज्ज्वलित रहे और त्रिभुवन का चिरकालीन स्वप्न सिद्ध हुआ। उसे श्री रामविजयजी नाम प्राप्त हुआ। उस समय श्री मंगलविजयजी महाराज के मुंह से सहजता से ये शब्द निकले कि ये टिमटिमाते दीपक ऐसा संकेत दे रहे हैं कि श्री रामविजयजी के जीवन में अनेक तूफान आएंगे, परंतु ये तूफान इनको झुका नहीं सकेंगे। श्री रामविजयजी इनसे संघर्ष करते हुए सदैव विजयश्री ही प्राप्त करेंगे।
यह भविष्यवाणी कितनी सही साबित हुई उसके वर्तमान युग के अनेक लोग साक्षी हैं। दीक्षा का वो शुभ दिन वि. सं. १९६९, पौष सुदि १३ था।