१६. छः महिने से अधिक जीवन नहीं
प्रथम चातुर्मास सिनोर में हुआ। थोड़े समय में उनके शरीर पर खुजली होने लगी। एक वैद्य को बताने पर उसने ढाई तोला सफेद मिर्च, शुद्ध घी एवं खड़ी शक्कर के साथ लेने के लिए कहा। लेकिन यह उपचार उल्टा पड़ गया। शारीरिक वेदना बढ़ गई। शरीर में जलन तेज हुई, चमड़ी काली पड़ गई। दूसरे वैद्य को बताया तो उन्होंने दूसरी दवाई बताई, जिससे दर्द रुका।
जलन तो कम हुई, परंतु ढाई तोला मिर्च पेट में जाने से पित्त का प्रकोप स्थायी हो गया। अहमदाबाद का विहार तय हुआ। अहमदाबाद में विराजमान पू. बापजी महाराज के आग्रह से साथ में डोली रखी गई। परंतु डोली का उपयोग किए बिना ज्येष्ठों के साथ अहमदाबाद विद्याशाला पधारे।
एक अच्छे वैद्य को दिखाया गया, उसने ज्येष्ठों को कहा कि श्री रामविजयजी महाराज के शरीर में ऐसा रोग पैदा हुआ है कि उस वजह से ये छः महिने से ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहेंगे। वैद्य की यह बात सुनकर सभी श्रेष्ठीगण चिंतित हो गये। इसी चर्चा में एक अनुभवी डॉक्टर से संपर्क हुआ। उन्होंने महाराज की जांच कर बताया कि एक अंतिम प्रयोग करते हैं। ७०७ का एक इंजेक्शन इन्हें लेना पड़ेगा, जिससे इनकी जलन तो निश्चित ही शांत हो जाएगी। परंतु इंजेक्शन की प्रक्रिया ४० मिनट तक चलेगी। इंजेक्शन लेने के बाद इन्हें रात में भयंकर जलन होगी तथा प्यास भी लगेगी, फिर भी पानी की एक बूंद भी इन्हें देना नहीं है। यदि आप सबकी इतनी तैयारी हो तो मैं यह प्रयोग आजमाऊं।
समाज के सभी अग्रणी जमा हुए और आपस में विचार-विमर्श किया। कोई अन्य उपाय न देखते हुए यह इलाज करने का निर्णय हुआ। इस पर श्री रामविजयजी महाराज ने कहा कि इस तरह यदि पीड़ा जाती हो तो जलन और प्यास सहन करने की मेरी तैयारी है।
शाम को प्रतिक्रमण करने के बाद श्री मेघसूरिजी महाराज से श्री रामविजयजी महाराज ने विनती की कि मुझे शांति मिले इसलिए रात्रि में एक-एक साधु को क्रमानुसार मेरे पास बैठाना जो मेरी निगरानी करेंगे ताकि मेरी ओर से कोई भूल न हो। लगभग ४० मिनट तक यह इंजेक्शन चला और यह प्रयोग सफल रहा।
उस रात असह्य जलन और प्यास का दोहरा उपद्रव पल-पल बढ़ रहा था, परंतु रामविजयजी महाराज ने इसे शांतिपूर्वक सहन किया, जिसकी वजह से उस दिन से जलन तकलीफ हमेशा के लिए दूर हुई और उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ।