Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

१५. प्रवचन का प्रारंभ

पूज्य रामविजयजी महाराज पूज्य गुरुदेव के साथ विहार करते हुए सिनोर गांव में पधारे। वि. सं. १९६९ में उनका चातुर्मास सिनोर में ही हुआ। दीक्षा पश्चात्‌ यह उनका प्रथम चातुर्मास था। सिर्फ १७ वर्षीय इन नूतन मुनिराज का व्यक्तित्व वास्तव में अनोखा था।

एक दिन हमेशा व्याख्यान करने वाले मु. श्री दानविजयजी म. को दाढ़ में तेज दर्द होने से उनके परम दादा गुरु वचनसिद्ध महापुरुष उपाध्याय श्री वीरविजयजी महाराजा ने इन नूतन मुनिराज को आदेश दिया कि बीबा! (वे नूतन मुनिराज को बीबा का ही संबोधन करते थे) जाओ आज तुम व्याख्यान करो।

गुरु आदेश को शिरोधार्य कर महाराज घबराते हुए व्याख्यान करने गये। समकित के सड़सठ बोल की सज्झाय का आधार लेकर व्याख्यान किया। उनकी सुंदर शैली से श्रोता प्रभावित हुए।

पाट से उतरकर पू, उपाध्याय श्री वीरविजयजी महाराज को वंदन किया तब उन वचनसिद्ध वृद्ध महापुरुष ने आशीर्वाद देते हुए कहा- जाओ बीबा! तुम बड़े वक्ता बनोगे। उनका यह जादुई वचन फलीभूत हुआ, जिसका अनुभव सारे जैन संघ ने किया।

उन्होंने जिस पाट से प्रथम व्याख्यान दिया था उस ऐतिहासिक पाट को आज भी सिनोर जैन संघ ने स्मृति स्वरूप सुरक्षित रखी है और उसके दर्शन मात्र से धन्यता का अनुभव होता है।

आज तो पुराने उपाश्रय के चोखटे भी नहीं रहे और गोरजी के संगमरमर की छत्रीवाली पाट भी नहीं रही। एक नया बड़ा उपाश्रय नर्मदा के किनारे खड़ा हुआ है, जहां वो पुरानी पाट और जगह के अवशेष अभी भी सुरक्षित रखे गए हैं।