Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

२. अदृश्य सहाय

पूज्यश्री की मातुश्री समरथबेन मृत्यु पश्चात्‌ देव बनी होंगी, इस बात का एहसास कराता एक प्रसंग उनके बचपन में घटित हुआ।

पूज्यश्री ‘त्रिभुवन” नामधारी थे, उस समय माता के स्वर्गवास बाद एक बार बालक त्रिभुवन की आंखों में तेज दर्द होने लगा। आंख भी खुल न सके ऐसी भयंकर वेदना सहन करता त्रिभुवन घर की सीढ़ियों के पास जाकर सो गया। ये सीढ़ियां घर के ऊपर की मंजिल पर जाती थीं। पूरी रात सोया नहीं था और आंखों में तेज दर्द था। आंखें मूंदी थीं, आस-पास कोई नहीं था। अचानक उसे ऊपरी मंजिल से नीचे उतरते हुए अपनी माता समरथबेन दिखाई दी। धीरे-धीरे चलकर वे त्रिभुवन के पास आईं और उसकी दुखती आंखों पर हाथ फिराया। डर के मारे त्रिभुवन जोर से चिल्‍ला उठा और उसकी आंख खुल गई। उसकी आवाज सुनकर आस-पास से दादीमां और बुआ दौड़ कर आईं। सभी ने पूछा- बेटा क्या हुआ? दर्द अधिक है क्या? तुम जोर से चिल्ला क्यों रहे थे?

त्रिभुवन ने कहा- मेरी माता मेरे पास आई थी। उसने मेरी आंखों पर हाथ रखा, जिससे मैं डर के मारे चिल्ला उठा। मां अदृश्य हो गई और मेरा दर्द भी चला गया। इस तरह त्रिभुवन के जीवन में चमत्कार हो गया। सभी को विश्वास हो गया त्रिभुवन की माता देवात्मा ही होगी, नहीं तो उसके स्पर्शमात्र से आंखों का भयंकर दर्द इस तरह क्षणमात्र में ही खत्म नहीं हो सकता। इस तरह सहायक बनने वाली देवात्मा समरथबेन की समर्थ सहायता तो पल पल और कदम कदम पर चालू ही थी।