Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

८. त्रिभुबन का व्यक्तित्व

पादरा में रतन बा का विराट व्यक्तित्व आदरणीय था। उसी तरह त्रिभुवन के व्यक्तित्व को भी वरिष्ठजन मान्यता देते थे। रतन बा जब भी पूजा करने जातीं तो रास्ते में दुकानदार अपनी दुकानों से नीचे उतरकर उनको नमन करते थे। संघ के प्रमुख लोग भी त्रिभुवन की सलाह को महत्व देते थे।

एक बार पू, सागरजी महाराज का पादरा में आगमन निश्चित हुआ। पादरा में श्री बुद्धिसागरसूरिजी महाराज को मानने वाला वर्ग अधिक Oथा। उस समय उस वर्ग ने व्याख्यान पाट के दोनों ओर श्री बुद्धिसागरसूरिजी महाराज के बड़े-बड़े फोटो लगा दिए। त्रिभुवन को लगा कि इस विषय से वातावरण तंग हो सकता है। इसलिए पू, सागरजी महाराज के पास अगले स्थान पर पहुंचकर उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया और अंत में कहा कि आप समझ लेना कि आपके आस-पास दो चौकीदार आपकी रक्षा करने खड़े हैं।

पू. सागरजी महाराज ने त्रिभुवन की विनती को मान्य रखा और एक विवाद होता रुक गया।

पादरा एवं आस-पास विचरते अधिकांश आचार्य भगवंत त्रिभुवन की संयम भावना से परिचित होने से अकसर उसे कहते कि तुम हमारे पास दीक्षा लो, तो तुम्हारी प्रगति शीघ्र होगी और तुम कुछ ही समय में आचार्य बन जाओगे। तब बेबाक त्रिभुवन विनम्रता से उन्हें कहता कि मैं तो मेरी आत्मा का कल्याण करे ऐसे गुरुदेव की खोज में हूं। आचार्य पद की लालच में यदि मैं पडु तो फिर मेरा कल्याण कैसे होगा?

विचरते साधु-भगवंतों का अकसर पादरा आना-जाना रहता था। त्रिभुवन अकसर उपाश्रय में ही रहता था। साधु भगवंतों को गोचरी हेतु ले जाना,विहार आदि की व्यवस्था देखना उसकी जिम्मेदारी थी।