६. सबका प्यारा सबूड़ा
बालक त्रिभुवन के जन्म पश्चात् माता पीहर से पुनः पादरा जब तक आती उसके पहले ही पिताश्री छोटालाल का असामयिक निधन हो गया।
छोटालाल की दादी (त्रिभुवन की परदादी) का नाम रतन बा था। छोटालाल के दो अन्य भाई भी थे। उनके परिवार में बालक जीवित नहीं रहते थे। यदि कोई बालक जीवित रहता था तो उनके विचित्र नाम रखने की परंपरा थी, जो गांवों में अब भी प्रचलित है। इसलिए बालक त्रिभुवन को माता और दादीमां सबूड़ा के नाम से बुलाती थीं।
पादरा में झंडा बाजार के पास स्थित सरकारी स्कूल के निकट चाल के छोटे से घर में रतन बा का परिवार रहता था। जिनकी आर्थिक स्थिति साधारण थी।
सात वर्ष की उम्र में त्रिभुवन की माता समरथबेन का मिर्गी की बीमारी के कारण देहांत हो गया।
त्रिभुवन ने शिक्षा हेतु सरकारी स्कूल में दाखिला लिया। उस जमाने में लड़कों में हाफ पैंट पहनने का प्रचलन था, पायजामा पहनने की प्रथा चालू नहीं हुई थी। विद्यार्थी स्कूल में कमीज, धोती और सिर पर टोपी पहनकर जाते थे।
स्कूल में तब पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी। बच्चे आस-पास के घरों में जाकर पानी पीते थे। त्रिभुवन का घर स्कूल के पास होने से अधिकांश जैन बच्चे त्रिभुवन के घर पानी पीने आते थे, जिन्हें त्रिभुवन प्रेम से पानी पिलाता था।
विद्यालय अध्ययन के पश्चात् त्रिभुवन को नौकरी पर भेजा गया। उस समय पादरा में चुनीलाल शिवलाल की अनाज का बहुत बड़ा कारोबार करने वाली पेढ़ी चल रही थी, जो राजस्थान और उत्तर भारत से अनाज ट्रेन द्वारा पादरा मंगाते थे।
किशोर त्रिभुवन की योग्यता देखकर शेठ चुनीलाल ने उसे राजस्थान के बालोतरा में अनाज की खरीदी के लिए भेजा। ऐसा लंबी दूरी का प्रवास अकेला करने तथा खरीदी हेतु दूरदराज के क्षेत्र में अकेले जाने के कारण त्रिभुवन की योग्यता की बात पादरा में चर्चित हो गई।