Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

२७. स्वागत और बहिष्कार

मुंबई के प्रवचन प्रकाश की चमक गुजरात तक फैली और उसका असर वहां तक भी पड़ा। इससे उनके अनुयायी के साथ उनका विरोधी वर्ग भी बढ़ा। भावनगर, लींबड़ी में प्रवेश के समय दीक्षा विरोधी वर्ग ने वातावरण को बेहद खराब किया। लींबड़ी के ठाकुर को वातावरण की उग्रता भांपकर श्री रामविजयजी महाराज को कहना पड़ा कि साहेब परिस्थिति अत्यंत विचित्र है, प्रवेश कैसे होगा?

पूज्यश्री ने शांति से उत्तर दिया, “यह तो हमारे घर की ही बात है, इसलिए इसे शांत होने में समय नहीं लगेगा।’” सुबह के समय पूज्यश्री का सामैया विभिन्न मार्गों से गुजरता हुआ उपाश्रय में आया। मंगलाचरण के बाद विरोधी युवक वर्ग ने प्रवचन को रोकने हेतु यह मांग की कि सर्वप्रथम हमें हमारे प्रश्नों का उत्तर मिलना चाहिए, उसके बिना हमारा विरोध शांत नहीं होगा।

पं. श्री रामविजयजी महाराज ने उनकी मांग को स्वीकार कर कहा कि दोपहर दो बजे आपको आपके सभी प्रश्नों के उत्तर दिए जाएंगे। बस! उग्र युवक शांत हो गये। प्रवचन शुरू हुआ। प्रवचन की समाप्ति तक तो बिना पूछे अधिकतर प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हो चुके थे। दोपहर में प्रश्नों की झड़ी लगी, लेकिन सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होते ही विरोधी दांतों तले उंगली दबाकर रह गये।

यही सिलसिला वढवाण में प्रवेश के समय भी चालू रहा। व्यक्ति को देखे समझे बिना ही विरोध करने वाले लोग श्री रामविजयजी महाराज से ही सामने से पूछते हैं कि रामविजयजी महाराज कहां हैं? हमें काले झंडे दिखाकर उनका विरोध करना है। जब वे उत्तर में कहते हैं कि मैं ही हूं रामविजय, आप खुशी से मेरा विरोध कर सकते हैं, तब विरोधी झेंपने लगते हैं और उनके हाथ से अपने आप काले झंडे गिर जाते हैं।

“हराम विजयजी! वापस जाओ” के विरोधी फलकों को सुधारकर “हे रामविजयजी! भले पधारो” से सुशोभित फलकों द्वारा रंगे हुए विख्यात पाटण के चातुर्मास प्रवेश की रोमांचक घटना आज भी पाटण के वातावरण में गूंज रही है। इस तरह मुंबई की शासन प्रभावना के पश्चात्‌ का काल पू. पं. श्री रामविजयजी महाराज के लिए एक ओर उनके भक्तों की वृद्धि करने वाला तो दूसरी ओर उनके प्रति विरोध का वातावरण भी व्यापक बनाने वाला बन गया था।