७. तेजस्वी विद्यार्थी त्रिभुवन
त्रिभुवन को व्यावहारिक शिक्षा में रुचि नहीं थी, लेकिन नवघरी नामक मोहल्ले में स्थित उपाश्रय में शाम को जो धार्मिक पाठशाला चलती थी उसमें अधिक रुचि थी। पादरा की नवघरी उस जमाने में धार्मिक प्रवृत्तियों का मुख्य केंद्र थी। बड़े-बड़े आचार्य भगवंत पादरा जैसे छोटे गांव को चातुर्मास का लाभ देते थे। पादरा में दो जैन मंदिर हैं। नवघरी के पास शांतिनाथ भगवान का बड़ा मंदिर और शेठ बाजार के पास स्थित संभवनाथ भगवान का छोटा मंदिर। त्रिभुवन छोटे मंदिर के पास रहता इसलिए वहीं पूजा करने जाता।
परंतु पाठशाला सिर्फ नवघरी में ही थी इसलिए शाम को नवघरी में पाठशाला जाता। पाठशाला के शिक्षक उजमशी मास्तर खूब श्रद्धालु और होशियार थे। त्रिभुवन ने छोटी उम्र में ही पंच प्रतिक्रमण के सूत्र, जीवविचार तथा नवतत्त्व आदि सूत्रों, स्तवन एवं सज्झाय कंठस्थ कर लिए।
उजमशी मास्तर मधुर कंठी थे। उनके उच्चारण अत्यंत शुद्ध थे। वे संगीत के भी जानकार थे। वे अपने मधुर कंठ से स्तवन और सज्झाय आदि स्वयं गाते और विद्यार्थियों से भी गवाते थे। वे कवि भी थे और स्वयं नये-नये स्तवनों एवं सज्झायों की रचना करते थे। त्रिभुवन उजमशी मास्तर के प्रिय विद्यार्थी थे।
छोटी उम्र में ही त्रिभुवन को सब जगह मान-सम्मान मिलता था। घर में मान, स्कूल में मान, पाठशाला में मान और संघ में भी मान।