२४. कोर्ट में निर्दोष पूज्यश्री
वि.सं.१९७६ से १९८० तक की कालावधि जैन जगत में विविध महत्वपूर्ण एवं रोमांचक प्रसंगों से भरपूर रही। जिसमें पूज्यश्री का नाम प्रमुख था। इस एक दशक के दरम्यान पूज्यश्री जैन और जैनेतर जगत में मुनि रामविजयजी के नाम से प्रसिद्ध हो गये।
समाजसुधारकों की ओर से जगह-जगह पृज्यश्री के समक्ष विरोध के मोर्चे खोले गये। पूज्यश्री ने भी उतने ही प्रभावी ढंग से उनकी शासनविरोधी प्रवृत्तियों का विरोध किया। इससे विचलित विरोधियों ने अलग-अलग आरोप लगाये और पूज्यश्री के खिलाफ कोर्ट में गये।
मुंबई-अहमदाबाद जैसे स्थानों पर अलग-अलग निमित्त बनाकर लगभग ६-७ केस न्यायालय में दाखिल किए गए। एक केस में तो “मुझे इस साधु ने ओघे से मारा” ऐसा आरोप करती एक महिला को खड़ा किया गया।
दूसरे एक केस में पूज्यश्री के उपदेश से सिद्धांत रक्षा के लिए प्रकाशित हो रहे एक साप्ताहिक के तंत्री के ऊपर मानहानि का केस दर्ज किया गया। इन सभीकेसों में वकील पूज्यश्री को समझाते कि साहेब! आप अपने बयान में ऐसा बोलनाऔर ऐसा नहीं बोलना, ताकि आप गुनाह में न आएं और आपको सजा न हो। लेकिन पृज्यश्री इस बात को मानने से स्पष्ट इनकार करते, तब वकील कहते कि साहेब! हम जब कोर्ट में खड़े हों और आप जैसों को सजा हो जाये तो ऐसे में हमारी वकालत पर एक दाग जैसा लगता है। इस समाज को हम क्या बताएं?पूज्यश्री उत्तर में कहते कि मैं जो सत्य और हकीकत है उसके विपरीत यदि कुछ कहूं तो मेरे महाव्रत को कलंक लगे तो उसका क्या? प्रत्युत्तर में वकील कहते कि तो हम केस चलते वक्त उपस्थित नहीं रह सकते हैं। पूज्यश्री कहते कि उसकी चिंता मत करो मैं सबकुछ संभाल लूंगा और सत्य बयां करते जो भी परिणाम आएंगे वो मैं भुगत लूंगा, परंतु मुझसे असत्य नहीं बोला जा सकेगा। दूसरे दिन पूज्यश्री के बयान दर्ज हुए। वकील अनुपस्थित रहे। जज अंग्रेज था। जज द्वारा पूछे गए तमाम प्रश्नों के उत्तर सत्य और बेझिझक देने से प्रभावित हुए जज ने पूज्यश्री को निर्दोष जाहिर किया। इसी तरह दूसरे बहुत से केसों में भी पूज्यश्री अपने सिद्धांतनिष्ठ एवं शास्त्रसम्मत बुद्धि प्रतिभा के प्रभाव से अणिशुद्ध निर्दोष सिद्ध होकर बाहर आये।