Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

३०. जैन प्रवचन प्रारंभ

वि.सं. १९८५ में पूज्य आचार्यदेव श्री दानसूरीश्वरजी महाराजा, श्री प्रेमसूरीश्वरजी महाराजा, श्री रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा आदि मुंबई पधारे।

लालबाग में प्रवचन गंगा धाराप्रवाह बह रही थी। श्रद्धालुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही थी। पृज्यश्री शास्त्रसम्मत दीक्षा आदि अनुष्ठानों का प्रतिपादन करते थे। उनके विरोध में मुंबई समाचार आदि अखबारों में विरोध प्रकट करते लेख प्रकाशित होने लगे। पृज्यश्री अपने प्रवचन में उन लेखों का सचोट- शास्त्रीय उत्तर देते।

वातावरण धीरे-धीरे ज्यादा उग्र होने लगा। लालबाग में प्रवचन दौरान विघ्नप्रेमी लोगों ने बाधा भी डाली। प्रवचन बंद करवाने के लिए जोरदार प्रयास किये। परंतु अंशमात्र भी विचलित हुए बिना पूज्यश्री ने शास्त्रसम्मत विवेचना के माध्यम से प्रवचन चालू रखे।

एक बार महावीर विद्यालय में जाहिर प्रवचन रखा। उसके समाचार सब जगह फैले, प्रवचन में बाधा डालने के बहुत प्रयत्न हुए, परंतु प्रवचन शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। जिससे विरोधी वर्ग और अधिक उग्र हो गया।

दूसरी बार कोट टाऊन हॉल में जाहिर प्रवचन रखा गया। प्रवचन न हो इसके लिए विरोधियों ने बहुत हंगामा किया, परंतु पूज्यश्री का वहां पर भी प्रवचन होते ही जिनशासन में जय-जयकार का वातावरण हुआ।

वि. सं. १९८५ के चातुर्मास में पृज्यश्री के प्रवचनों का लाभ घर बैठे भी प्राप्त हो इसके लिए “श्री जैन प्रवचन” नाम से पाक्षिक शुरू किया गया। आगे चलकर उसके कई संपादकों ने भागवती प्रव्रज्या अंगीकार की थी। पृज्यश्री के श्री जैन प्रवचनों के माध्यम से अनेक आत्माएं प्रभु शासन में स्थिर हुई थीं।

कितनी पुण्यात्माएं ऐसी थीं, जिन्होंने पूज्यश्री को कभी देखा-सुना नहीं था, सिर्फ “श्री जैन प्रवचन” के पठन से उन्होंने धर्म पाया था और दीक्षा ग्रहण की थी।