Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

११. विघ्नों की झड़ी

श्री प्रेमविजयजी महाराज ने त्रिभुवन की योग्यता को पहचान लिया था।पौष सुदि १३ का दिन सर्वश्रेष्ठ था। बड़ौदा में दीक्षा योग्य स्थिति नहीं थी। पू. उपाध्याय श्री वीरविजयजी महाराज जंबुसर में विराजमान थे। एक-दो दिन के विचार-विमर्श के पश्चात्‌ सब व्यवस्था हो गई। कोठारी परिवार ने कुंकुम तिलक किया। त्रिभुवन जंबुसर की ओर रवाना हो गया। बड़ौदा-मासर रोड की रेलगाड़ी पादरा होकर जाती है, इसलिए कोई उसे पहचान न ले इसका डर था। अतएव उसने पादरा व आसपास के क्षेत्र का रेल प्रवास सीट के नीचे सोकर पूरा किया। रात्रि में ८ बजे मासर रोड पहुंचा।

मासर रोड से जंबुसर ६ मील दूर था। रात का समय था, मन में भय भी था। इसलिए जंबुसर जा रही एक बैलगाड़ी के पीछे-पीछे पैदल चलकर १७ वर्षीय त्रिभुवन रात के करीब ११ बजे जंबुसर पहुंचा। वहां पर उपाश्रय में जाकर उसने पूज्य उपाध्यायजी महाराज को सारी बात बताई। उन्होंने उसे सोने के लिए कहा। रात में अन्य साधु-भगवंतों को उठाकर उन्होंने कहा कि कल सुबह ही हमें विहार कर आमोद जाना है और पौष सुदि १३ को त्रिभुवन को दीक्षा देनी है। सोये हुए त्रिभुवन ने यह बात सुनी तो उसे अपार आनंद आया और मन में विचार आया कि अब यह मुहूर्त खाली नहीं जाएगा।

पौष सुदि १२ को सुबह पू. उपाध्यायजी महाराज के साथ त्रिभुवन भी विहार कर आमोद आया। कुछ समय बाद वंदन करने आई एक श्राविका ने त्रिभुवन को पहचान लिया। उन्होंने पूछा- सबूड़ा! तू यहां कैसे ? त्रिभुवन का प्यारा नाम सबूड़ा था। सबूड़ा ने योग्य उत्तर देकर उस श्राविका को विदा किया। वो बहन त्रिभुवन की संबंधी होने से पू. उपाध्यायजी महाराज चिंतित हो गए कि इस गांव में भी त्रिभुवन को दीक्षा नहीं दी जा सकती। इस बात की जानकारी से त्रिभुवन व्यथित हो गया। उसने मंगलविजयजी महाराज से कहा कि आपश्री इस मुहूर्त में दीक्षा हो जाये इसके लिए कुछ करो।