१३. सबको मैं समझा दूंगा
गंधार में दीक्षा विधि संपन्न हो गई। दीक्षा के पश्चात् भरुच पहुंचते ही पादरा से स्नेही-संबंधियों का समूह आ पहुंचा। उपाध्यायजी महाराज को नूतन मुनिवर ने कहा कि आप चिंता नहीं करें, मैं सबको समझा दूंगा।
पादरा में दीक्षा का समाचार पहुंचते ही वहां पर बवाल हो गया। लोग किसी भी हालत में त्रिभुवन को घर वापस लाने की बात करने लगे। इसी जुनून के साथ सभी ने भरुच कूच किया। दादीमां रतन बा को बहुत आघात लगा, परंतु वे समझदार थीं। इसलिए उन्होंने भरुच जाने वाले तीन-चार होशियार लोगों से व्यक्तिगत रूप से कहा कि त्रिभुवन ने यदि हकीकत में दीक्षा ले ली है और यहां वापस आने का इच्छुक नहीं है तो उसे जबर्दस्ती मत लाना, परंतु मेरी ओर से उसे सिर्फ इतना ही कहना कि संयम जीवन का अच्छी तरह से पालन करे।
पादरा से रवाना हुए लोग भरुच पहुंचे। उपाश्रय गूंज उठा। श्री रामविजयजी ने सभी से कहा कि इस तरह से शोरगुल और हो-हल्ला करने का क्या मतलब! आप सबको जवाब देने के लिए मैं उत्तरदायी हूं, इसलिए आप सभी शांति से बैठें। सभी नूतन मुनिराज के सामने बैठ गए। दो घंटे तक वार्तालाप हुआ। नूतन मुनि अपने निर्णय पर अटल थे। उनकी दृढ़ता देखकर प्रमुख लोगों ने कहा कि हमारे साथ रतन बा ने संदेश भेजा है कि रामविजय वापस आने के लिए यदि तैयार नहीं हों तो उन्हें जबर्दस्ती लेकर नहीं आएं। मेरी ओर से उन्हें कहना कि संयम जीवन का पालन अच्छी तरह से करें।
भरुच से विहार कर सभी मुनिवर जंबुसर आए। वहां पू. प्रेमविजयजी महाराज आदि श्री रामविजयजी महाराज को लेने पहुंचे। जंबुसर से विहार कर सभी बड़ौदा पहुंचे। दो दिन में ३४ मील का विहार होने से श्री रामविजयजी महाराज के पांवों में सूजन आ गया। दो-तीन दिनों के उपचार के पश्चात् सूजन उतर जाने से नूतन मुनिराज को बड़ी दीक्षा के जोग में प्रवेश करवाया गया और १९६९ के फाल्गुन सुदि २ को पू मु. श्री हंसविजयजी महाराज और पू, पं. श्री संपतविजयजी गणिवर की निश्रा में मुनिश्री रामविजयजी की बड़ी दीक्षा संपन्न होते ही सभी में हर्ष की लहर फैल गई।