Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

२९. व्याख्यान बंद नहीं रहेगा

मुंबई में सुधारवादी आचार्य के सुधारवाद का पूज्यश्री जोरशोर से खंडन करते थे। तब विरोधियों के उग्र प्रचार के कारण जगह-जगह दोनों पक्षों के जैनों में उग्र संघर्ष और आपसी झगड़े होने लगे। उस समय बहुत से शांतिप्रिय सुधारक अग्रणियों की एक समिति बनाई गई। यह समिति दोनों पक्षों के व्याख्यान बंद कराने हेतु पहले सुधारवादी आचार्य के पास गयी और व्याख्यान बंद करने का निवेदन किया तब उस सुधारवादी आचार्य ने व्याख्यान बंद करने की बात को स्वीकार किया। तत्पश्चात्‌ वो समिति लालबाग आयी और श्री दानसूरीश्वरजी महाराज के पास पूज्यश्री का व्याख्यान बंद कराने का निवेदन किया। तब श्री दानसूरीश्वरजी महाराज ने मुनिश्री रामविजयजी म. सा. को बुलाकर कहा कि ये समिति के सदस्य जो बात करने आये हैं, वो सुनकर उन्हें यथोचित उत्तर दो।

पूज्यश्री ने पूछा व्याख्यान क्‍यों बंद रखना है? तो समिति ने कहा कि साहेब व्याख्यान से अशांति बढ़ती है। पूज्यश्री ने कहा कि व्याख्यान में यदि हम शास्त्र के विरुद्ध कुछ भी बोलते हैं तो आप श्रावकों को व्याख्यान बंद कराने का अधिकार है। परंतु जब हम परमात्मा के शास्त्रों की बात सुनाते हैं और फिर भी कोई अज्ञानी अशांति पैदा करता है तो ऐसी गलत अशांति पैदा करने वालों को रोकने का आपको प्रयास करना चाहिए लेकिन उसके बनिस्बत आपके जैसे श्रावक व्याख्यान बंद कराने की बात करते हैं तो वह सर्वथा गलत है। आने वाले लोगों ने जब देखा कि महाराज व्याख्यान बंद करने की बात नहीं मानेंगे, तो उन्होंने थोड़ा उग्र होकर कहा कि यदि आपका यही आग्रह है तो आप समझ लें कि कल से एक भी व्यक्ति आपके व्याख्यान में नहीं आएगा। पृज्यश्री ने कहा कि उसकी चिंता आप नहीं करें। कोई नहीं आएगा तो मैं उपाश्रय की दीवार व खंभों को सुनाऊंगा, पर इतना लिखकर रख लीजिए कि व्याख्यान बंद नहीं होंगे।

इतना सुनकर समिति के लोगों ने हाथ जोड़कर खड़े होकर कहा कि महाराज इतना सुन लीजिए कि कल से यदि कोई तूफान होगा तो आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी नहीं। पूज्यश्री ने इतनी ही दृढ़ता के साथ कहा कि आपकी सुरक्षा के भरोसे हम साधु नहीं बने, इसलिए हमारी चिंता मत कीजिए। हमारा धर्म हमारी रक्षा करेगा, फिर भी कोई आपत्ति आई तो वह सहन करना हमारा धर्म है।

आये हुए सेठ लोग गुस्साकर चले गये। परंतु सीढ़ी उतरते-उतरते उनमें से एक अग्रणी श्री जीवतलाल प्रतापसी के दिमाग में एक बात कौंधी कि हकीकत में साधु तो यही सच्चा है, जिसे दुनिया के बड़े शेठ साहुकारों की भी चिंता नहीं। उसी समय वे वापस ऊपर गये और पृज्यश्री से क्षमा मांगकर कहा कि साहेब हमसे भूल हुई, आपका मार्ग ही सच्चा है। आप व्याख्यान चालू ही रखिएगा। आपकी सेवा में मैं अपना सिर भी देने के लिए तैयार हूं।