१. एक पुण्य सितारे का उदय
| जन्म | वि. सं. १९५२, फाल्गुन वदि ४ |
| त्रिभुवन का जन्म स्थान एवं ननिहाल | गांव दहेवाण |
| त्रिभुवन की मातृभूमि | पादरा |
| पिता | छोटालाल |
| माता | समरथबेन |
जन्म के पश्चात् अल्प समय में ही पिताजी का देहान्त होने से वे अपने पिता का मुख भी नहीं देख पाये। सात वर्ष की अल्पायु में ही मातुश्री समरथबेन का भी स्वर्गवास हो गया। अपनी परदादी रतन बा के हाथों इनका पालन-पोषण हुआ। रतन बा ने त्रिभुवन में धर्म-संस्कारों का सिंचन किया। चार वर्ष के त्रिभुवन को रोज सुबह पांच बजे उठाकर अपने पास कटासणे पर बैठाकर प्रतिक्रमण कराने का नियम, उसमें यदि बाल त्रिभुवन को नींद आ जाये तो कटासणे पर ही सो जाने देती, परन्तु प्रतिक्रमण जरूर कराती। घर पर साधु-महात्मा गोचरी के लिए पधारते तो बहोराते समय त्रिभुवन को पास खड़ा रखती और कहती कि देखो बेटा! तुम्हें भी एक दिन साधु बनना है। इस तरह बालक को साधु बनने की प्रेरणा देती और साथ में यह भी कहती कि देखो बेटा! तुम्हें दीक्षा जरूर लेनी है, परन्तु मेरी मृत्यु के पश्चात्। एक समय इस घर में १५० लोग एक साथ रहते-खाते थे, परन्तु अब तू और मैं दो ही बचे हैं। इसलिए तेरे बिना मैं रह नहीं सकूंगी। मेरे जाने के बाद ही दीक्षा लेना। बालक को भी उस समय दादीमां की बात ठीक लग रही थी।
पादरा में उस समय साधु-महात्माओं का आना-जाना होता रहता था। त्रिभुवन को स्कूल जाने के पश्चात् जो भी खाली समय बचता था, उसमें से अधिकांश समय वह उपाश्रय में बिताता था। साधु-महात्मा आएं तो उनको लेने जाना, उनसे ज्ञान प्राप्त करना, गांव में साधु-महात्माओं के साथ गोचरी हेतु जाना, विहार करें तो उनको छोड़ने जाना, समय मिलने पर ज्ञान भंडार की पुस्तकें पढ़ना, ये सब उसके नियम जैसे बन गये थे। बचपन से उसे पढ़ने का बहुत शौक था। नौ वर्ष की उम्र तक तो ज्ञान भंडार की अधिकांश गुजराती भाषा की पुस्तकें पढ़ ली थीं। पाठशाला में नियमित अभ्यास करना उसकी दैनिक क्रिया थी। पाठशाला में उस समय उजमशी मास्तर शिक्षक थे। वे उच्च धार्मिक वृत्ति के क्रिया चुस्त थे। उन्होंने समकित के ६७ बोल की सज्झाय की परीक्षा ली, उसमें सभी बालकों में त्रिभुवन का पहला नम्बर आया। बुद्धिशाली एवं तेजस्वी होने की वजह से शिक्षक का वह प्रिय छात्र बन गया।