४. संघ मान्य त्रिभुवन
एक समय पादरा गांव में किसी अन्य संप्रदाय के महात्मा पधारे। त्रिभुवन उन्हें भी उपाश्रय लेकर गया। संघ के प्रमुख श्री मोहनभाई को इस बात की जानकारी हुई। वे अकसर वकालत हेतु बड़ौदा आया-जाया करते थे। उन्होंने त्रिभुवन को बुलाकर कहा- बेटा! ऐसी भूल तुमने कैसे की? संघ में बिना कारण ही विवाद पैदा होगा। त्रिभुवन बात को समझ गया। उसने कहा- आप निश्चिंत रहें, मैं स्थिति को संभाल लूंगा।
बावजूद भी महात्मा को गोचरी हेतु घर बताने गया। ठंडा होने के लिए बाहर रखे गए गर्म पानी के बर्तन को अंदर लेकर गया।
महात्मा को कहा- आप अंदर गोचरी का उपयोग करो, मैं भी भोजन करके आता हूं। बाद में आकर करबद्ध होकर विनम्रता से महात्मा को पूछा कि आप विहार कब करोगे? महात्मा ने पूछा क्यों? तो उसने कहा कि साहब! यह गांव ऐसा है कि आप अब विहार करो इसमें ही लाभ है।
महात्मा ने भी इस भक्तिभावी समर्पित बालक की सलाह मानकर शाम को ही विहार कर दिया। इससे शांतिपूर्वक समस्या का हल हो गया।
छोटी उम्र में भी इस तरह की व्यवहार कुशलता से त्रिभुवन संघ मान्य हो गया।