Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

२५. प्रखर वक्ता पूज्यश्री

श्री रामविजयजी म. सा. ने वि.सं. १९७० से १९७१ के चातुर्मास गुरु महाराज के साथ भावनगर में किए। उस दौरान “कम्मपयडी“ का अभ्यास गुरु भगवंत के पास इन्होंने किया था। इनके विद्याभ्यास के लिए प्रत्येक चातुर्मास में पंडितों की व्यवस्था की जाती थी। जिसके परिणामस्वरूप इनका शास्त्रीय अध्ययन भी गहराई से हुआ था।

देवद्रव्य, बालदीक्षा, व्यवहारिक संभाल, समाजसुधार, तिथि चर्चा आदि विषयों पर वे अपने विचार मोक्ष लक्ष्य की दृष्टि से शास्त्र के आधार पर प्रभावी ढंग से रखते थे। परंतु सिर्फ वर्तमान व्यवहार को ही उपयोगी मानने वाले लोगों के साथ ऐसे विषयों में वैचारिक संघर्ष होना तथा उसके कारण मतभेद पैदा होना स्वाभाविक है।

अपने जीवनकाल में उन्होंने ऐसे बहुत तूफान देखे थे, परंतु किसी भी प्रसंग पर वे विचलित नहीं हुए थे।

अपने विचार और निर्णय पर वे सदा अटल रहते थे। उनकी इसी अडिगता और निडरता के कारण उन्हें कई बार अनेक प्रकार के कष्टों का भी सामना करना पड़ता था, लेकिन वे निर्भयता से सबकुछ सहन कर लेते थे।

उन्हें हत्या करने की धमकी भरे पत्र भी कई बार मिलते, जिससे उनके गुरु महाराज प्रेमविजयजी म. रात्रि में उपाश्रय में उनके संथारे का स्थान बदली कर देते। उनकी गोचरी में जहर मिला दिया जाएगा, ऐसी अफवाह फैलती। इसके लिए उनके शिष्य भक्तिभाव से स्वेच्छापूर्वक पहले स्वयं गोचरी का उपयोग करते और बादमें उन्हें उपयोग करने देते।

उनके प्रवचन दौरान किसी भी विषय पर प्रश्न पूछने की छूट रहती थी और कितनी बार तो पूरा प्रवचन ही प्रश्नोत्तरी का रूप ले लेता था। वे व्याख्यान में कभी भी माइक का प्रयोग नहीं करते थे।

युवावस्था में उनकी आवाज बुलंद थी। हजारों जनमेदनी भी उनका प्रवचन शांतिपूर्वक सुनती थी। जीवन के अंत तक कभी भी उन्होंने व्याख्यान देने में आलस्य नहीं किया।