Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

३१. तीर्थयात्रा और उग्र विहार

वि. सं. १९८७ माघ सुदि ८ को मुंबई से उग्र विहार कर ३५ दिन में पालिताणा पहुंचे। फाल्गुन सुदि १५ को भारी गर्मी से दोपहर १ बजे श्री सिद्धाचल गिरिराज की छत्रछाया में प्रवेश कर तुरंत ही गिरिराज की यात्रा प्रारंभ की। तेज धूप में उल्लासपूर्वक यात्रा कर दादा के दरबार में पहुंचे और दादा आदिनाथ के दर्शन- स्तवन कर शाम को ही वापस तलेटी आये, उसके बाद पच्चखानण लिया।

सिद्धाचलजी में थोड़े दिन की स्थिरता के पश्चात्‌ खुद का अभिग्रह पूर्ण करने पूज्य दादा गुरुदेव की आज्ञा से गिरनारजी पधारे। भारी गर्मी के दिनों में शाम को ६-७ मील का विहार कर गिरनारजी तलेटी पहुंचे।

प्रातः काल गिरनारजी चढ़ना था। सभी शरीर पर उपकरण बांधे और हाथ में घड़ा लेकर ऊपर चढ़ रहे थे, तभी मार्ग में एक जगह बड़ा सर्प दिखाई दिया। उसे देखकर बालमुनि श्री कनकविजयजी म. घबराकर चीख उठे। पूज्यश्री ने उनका हाथ पकड़ लिया और हाथ पकड़कर ही ऊपर तक पूरी यात्रा की। ऊपर पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो गई थी। भूख-प्यास और अतिशय गर्मी से बेहाल होकर सभी अत्यन्त थक गये थे। धर्मशाला के मुनीम ने भाता का लाभ देने की भावभरी विनती की, तब पूज्यश्री ने उनकी विनती को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह तीर्थ सिद्धगिरिजी का टूंक है, इसलिए यहां पर आहार नहीं ले सकते। पानी भी मजबूरन उपयोग करना पड़ता है।

यद्यपि पूज्यश्री भी जानते थे कि सभी साधुगण भूख-प्यास से बेहाल हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने धर्मानुसार आचरण करना और संयम पालन करना अपना पुनीत कर्तव्य समझा। उसी समय अन्य समुदाय के दो-तीन महात्मा यात्रा कर नीचे उतरने की तैयारी में थे। पूज्यश्री ने उनसे कहा कि हम यात्रा कर लगभग पांच बजे नीचे पहुंचेंगे, आप थोड़ी व्यवस्था रखना। लगभग पांच बजे सभी साधुगण नीचे पहुंचे और जैसे-जैसे पहुंचते गये वैसे-वैसे उन महात्माओं ने सभी की भावपूर्वक भक्ति की।

ऐसी थी पूज्यश्री की तीर्थ भक्ति और ऐसा था उनका संयम पालन।