२६. शासन का सिंह
१९८५ वर्ष के चातुर्मास हेतु अपने गुरु भगवंतों के साथ श्री रामविजयजी महाराज ने सूरत से मुंबई की ओर विहार प्रारंभ किया। जिस प्रकार सिंह का नाम सुनकर छोटे-छोटे पशु-पक्षी भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार यह समाचार मुंबई में फैलते ही शासन के प्रति असमर्पित वर्ग भी भयभीत हो गया। इस वर्ग को लगा कि यदि मुंबई में रामविजयजी महाराज आते हैं तो वे हमारी समाजसुधार की बातों की धज्जियां उड़ाये बिना नहीं रहेंगे। अतएव षड़यंत्र के तहत सुधारवादी वर्ग ने मुंबई में अफवाहों एवं भयावह वातावरण का जाल फैला दिया। जिसके परिणामस्वरूप अहमदाबाद में विराजमान पू, आचार्यदेव श्री सिद्धिसूरिजी महाराज (पू, बापजी महाराजा) और पू. आ. श्री मेघसूरिजी महाराज जैसे सात्त्विक पुरुष भी घबरा गये। उन्होंने तार द्वारा यह समाचार भेजा कि मुंबई जाना फिलहाल स्थगित कर दो और वापस गुजरात की ओर विहार करो।
लेकिन यह तार जब तक मिलता तब तक सभी मुंबई के अंधेरी पहुंच गये थे। मुंबई के वातावरण से पू. दानसूरीश्वरजी महाराज का भी यह विचार बना कि अंधेरी चातुर्मास पश्चात् वापस गुजरात की ओर ही विहार करें तो अच्छा है। इस बारे में विचार-विमर्श करने के लिए सभी साधुओं को इकट्ठा किया गया। वहां बैठे श्री मंगलविजयजी महाराज को लगा कि इस तरह तो यह नाव किनारे आते-आते ही डूब जाएगी।
श्री मंगलविजयजी महाराज ने जोशपूर्वक उसी क्षण सबसे कहा कि युद्ध की घोषणा होते ही सेनापति सभी सैनिकों को इकट्ठा करता है और सभी में जोश का संचार करता है। ऐसी ही अपनी भी यह मीटिंग होनी चाहिए। जो पीछे हट जाये वो राजपूत नहीं। इन बातों से सभी के मन में हिम्मत का संचार हुआ और हिम्मत व जोश के साथ मुंबई में प्रवेश करने का तय हुआ। उनका मुंबई की ओर प्रयाण जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे स्वागत के सुरों के साथ-साथ विरोध की लहरें भी उठने लगीं। मुंबई के लालबाग में प्रवेश के दिन तो विरोधियों ने उन्हें रोकने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाये। यहां तक कि सामैया मार्ग पर कांच के टुकड़े बिखेरने से भी बाज नहीं आये। परंतु जहां कांच बिखेरने वाले थे वहीं खून आने की परवाह किये बिना बिखरे हुए कांच को अपने हाथ से उठाने वाले भक्त भी बड़ी संख्या में मौजूद थे।
श्री रामविजयजी महाराज की यह स्वागत यात्रा उनके सभी विरोधियों की मुरादों को जमींदोज करती हुई जब किसी तरह लालबाग पहुंची तब सभी के आनंद का पारावार नहीं रहा।