२१. बलि विरोधी उग्र आंदोलन
वि. सं. १९७६ का वर्ष अहमदाबाद के लिए महत्वपूर्ण बन गया। अहमदाबाद में नवरात्रि के दिनों में माताजी का उत्सव मनाया जाता था और दशहरे के दिन भद्रकाली माता के मंदिर में बकरे की बलि देने की प्रथा अनेक वर्षों से थी। अहमदाबाद जैसी धर्मनगरी में धर्म के नाम पर पंचेन्द्रिय जीव का वध बंद कराने के लिए रामविजयजी महाराज ने अहमदाबाद में उग्र आंदोलन शुरू किया। मोहल्ले- मोहल्ले जाकर अपने प्रवचन में इस विषय को प्रभावी रूप से उठाया। इस आंदोलन के कारण अहमदाबाद में बलि की बात चर्चा का विषय बन गई। इस विषय पर अहिंसा प्रेमी हिन्दू भी सम्मिलित हुए। अहमदाबाद माणेक चौक पर ५० हजार की जनमेदनी को संबोधित किया, जिससे अहमदाबाद में एक बड़े आंदोलन ने आकार लिया। दूसरी तरफ संघों की ओर से कानूनी कार्रवाई की गई। परिणाम स्वरूप भद्रकाली माता के मंदिर के आगे होने वाली इस हिंसक प्रथा को रोकने हजारों लोग एकत्रित हो गए। इस तरह प्रचंड विरोध के सामने पुजारियों को झुकना पड़ा और बलि का कार्यक्रम नहीं हो सका। उसके बाद भद्रकाली मंदिर में बलि की प्रथा हमेशा के लिए कानूनी रूप से बंद हो गई।
अहमदाबाद में उस समय कुत्तों की संख्या बहुत बढ़ गई थी और उससे जनमानस परेशान था। इससे बचने के लिए कुत्तों को मारना चाहिए, ऐसे विचार लोगों के मन में आने लगे। स्वाभाविक है कि ऐसे विचार को जैन समाज स्वीकार नहीं करता और इसका सख्त विरोध करता।
परंतु एक शर्मनाक घटना ऐसी घटी कि एक सुधारवादी धनवान जैन उद्योगपति ने लोगों की भावनाओं को और अधिक दुखाने के लिए जानबूझकर संवत्सरी के पवित्र दिन अपने बंगले के कंपाउंड में ६० कुत्तों को मरवा दिया।
इस घटना का उस समय भारी विरोध हुआ। कुत्ते मारने के पक्षधर के विरोध में रामविजयजी महाराज ने प्रखर आंदोलन का नाद किया। परिणाम स्वरूप कुत्तों को मारने की प्रवृत्ति तुरंत बंद हो गई।