Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

२८. मैं पाटण आने वाला ही हूं

विहार करते-करते एक बार पूज्यश्री पाटण की तरफ पधारे। पाटण संघ के कुछ श्रावकों ने पूज्यश्री से पाटण पधारने की आग्रहभरी विनती की, लेकिन उन मुद्ठीभर भक्तों की अपेक्षा विरोधी वर्ग बहुत बड़ा था।

पूज्यश्री पधार रहे हैं यह समाचार सुनते ही विरोधी वर्ग में बेचैनी फैल गई| उन सबने मिलकर एक आवेदन पत्र तैयार किया, जिसमें सैकड़ों लोगों के हस्ताक्षर करवाये गये| पूज्यश्री जब पाटण के पहले चाणस्मा पधारे, तब वहां उन्हें वह आवेदन पत्र दिया गया, जिसमें लिखा था कि पाटण में आपके आगमन का प्रबल विरोध है, इसलिए हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप पाटण नहीं पधारें| यदि पधारेंगे तो परिस्थिति विकट हो सकती है| आवेदन पत्र देखकर पूज्यश्री बिल्कुल शांत रहे| शांति से ही उन्होंने लोगों की बातें सुनीं और फिर उतनी ही शांति से दृढ़ शब्दों में उत्तर दिया कि देखिये, मेरे पाटण आगमन का विरोध है यह मैं भी जानता हूं, लेकिन विरोधियों की विनती पर मैं पाटण नहीं आ रहा हूं| जिन्होंने मुझसे विनती की है वे भी संघ के ही भाई हैं और उनकी विनती मैंने स्वीकारी है| इसलिए यदि वे मुझे मना करने आएंगे तो मैं अवश्य विचार करूंगा| लेकिन जब तक वे मुझे मना करने नहीं आएंगे तब तक उनको दिए गए वचन में रद्दोबदल करना मेरे लिए नामुमकिन है| इसलिए मैं पाटण आने वाला ही हूं|

पूज्यश्री पाटण पधारे। भक्तगण सामैया के साथ स्वागत में आगे आए तो विरोधी वर्ग भी विरोध के सूत्रोच्चार के साथ-साथ काले झंडे लेकर जमा हो गया।

प्रवेश मार्ग में पत्थरबाजी भी हुई। आपसी तूफान के बीच अटल रहकर पूज्यश्री उपाश्रय में पहुंचे। व्याख्यान शुरू हुआ। दैनिक प्रवचनों की अमी वर्षा में स्नान कर उन्मार्ग में गयीं अनेक आत्माएं सन्मार्ग की ओर मुड़ गयीं।

विरोध करने आयीं कई आत्माएं उनकी भक्त बन गयीं और धर्माराधना में जुट गयीं। ऐसा सिर्फ पाटण में ही नहीं, बल्कि पाटण जैसे अनेक गांवों में हुआ।

सिद्धांत पर मर-मिटने वाले पीछे हटते नहीं ।

शहादत को गले लगाने वाले कभी मरते नहीं ।।