Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

१०. कल किसने देखी है?

लगता है त्रिभुवन का जन्म सिर्फ संयम साधना के लिए ही हुआ था। शायद इसीलिए उसे ऐसे-ऐसे सुअवसर प्राप्त होते गए जिससे उसकी दिन-प्रतिदिन संयम भावना प्रबल होती गई। संयम स्वीकार करने का उसका संकल्प दृढ़ था, परंतु उस संकल्प को हकीकत में बदलने में जो रुकावट थी वो थी दादीमां रतन बा।

जितनी भी बार दादीमां ने त्रिभुवन को धर्म का सिंचन करते-करते संयम की प्रेरणा दी थी, उतनी बार साथ में यह भी कहा था कि तुम्हें मेरी मृत्यु के बाद ही दीक्षा लेनी है। दादीमां की यही बात उसे संसार त्यागने से रोक रही थी।

विक्रम संवत्‌ १९६८ के चातुर्मास हेतु पू. पं. श्री दानविजयजी गणिवर्य पादरा पधारे और पूज्य श्री वीरविजयजी गणिवर्य एवं मुनिराज श्री प्रेमविजयजी महाराज पादरा के समीप दरापरा गांव में चातुर्मास हेतु पधारे। त्रिभुवन पादरा में प्राप्त गुरु निश्रा का लाभ तो लेता ही था उसके बावजूद दरापरा में भी गुरुदेव के पास आते-जाते रहकर खुद की संयम भावना विशेष रूप से दृढ़ बनाता था। एक बार प्रेमविजयजी महाराज ने इतना ही कहा कि त्रिभुवन! किसी के जीवन का क्‍या भरोसा? दादीमां के पहले तू चला जाये, ऐसा कैसे नहीं हो? इसलिए दादीमां के लिए संयम स्वीकारने में देर नहीं करनी चाहिए। कल किसने देखा है?

गुरुदेव की इस बात ने चिंगारी का काम किया। त्रिभुवन के दिमाग में यह बात बैठ गई और मन ही मन यह निर्णय ले लिया कि चातुर्मास पश्चात्‌ जो भी प्रथम मुहूर्त आता है उस समय दीक्षा ग्रहण करनी है।

खुद की इस भावना को मन में दृढ़ बनाता त्रिभुवन चातुर्मास बाद एक दिन अचानक पौष सुदि ८ को बड़ौदा पहुंचा। वहां पर विराजित पं. श्री दानविजयजी म.तथा मुनिश्री प्रेमविजयजी म. के समक्ष उपस्थित होकर उसने विनती की कि गुरुदेव! दृढ़ संकल्प के साथ दीक्षा का मुहूर्त लेने आया हूं, इसलिए अल्प समय में ही आने वाला अच्छा दिन आप मुहूर्त के रूप में प्रदान करें, जिससे वर्षों से मेरा संजोया दीक्षा स्वप्न साकार हो।