Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

१४. दादीमां का मोहांध

दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात्‌ थोड़े महीनों में पादरा का दीक्षा विरोधी वातावरण धीरे-धीरे शांत हो चुका था। श्री रामविजयजी हृदय से ऐसा मानते थे कि मुझ पर दादीमां रतन बा का बड़ा उपकार और ऋण है। मुझे जो संयम मिला है, उसके मूल में रतन बा द्वारा किए गए संस्कारों का सिंचन ही है। इसलिए पादरा का वातावरण थोड़ा शांत हो जाये, तब पादरा जाकर रतन बा को धर्मलाभ देकर उनका हृदय ऐसा बनाना है, जिससे दीक्षा की अनुमोदना का पुण्य लाभ वे प्राप्त कर अपना भव सुधार सकें।

ऐसी भावना गुरुदेवों के समक्ष व्यक्त करने पर अनुकूल समय देखकर गुरुदेव श्री रामविजयजी को साथ लेकर पादरा पहुंचे। श्री रामविजयजी महाराज रतन बा के घर गोचरी गये। समझदार रतन बा का मोह फिर से हिलोरें लेने लगा। श्री रामविजयजी महाराज ने घर में प्रवेश किया और रतन बा ने घर का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया और कहा कि अब मैं आपको जाने नहीं दूंगी। जब तक मैं जिंदा हूं आपको यहीं रहना है। श्री रामविजयजी महाराज समझ गए कि यह मोह का आवेश है, इसलिए उन्होंने शास्त्र के आधार पर सिर्फ इतना ही कहा कि क्या मैं इस वेश में यहां रह सकता हूं?

इस छोटे से प्रश्न से रतन बा का मोहावेश शांत हो गया। फिर भी उन्होंने दूसरी मांग रखते हुए कहा कि मैं जब तक जिंदा हूं तब तक पादरा में ही रहने की विनती स्वीकार करो।

श्री रामविजयजी महाराज ने पुनः कहा कि बिना कारण इस तरह स्थिरवास करने की प्रभु की आज्ञा नहीं है, क्या यह बात आप नहीं जानतीं? लाड़ले के इन प्रश्नों का रतन बा क्या जवाब दे सकती थीं? पौत्र के प्रति मोह तो था, लेकिन मोहांधता नहीं थी। इसलिए प्रतिबंध उठाकर उन्होंने कहा कि अच्छे से अच्छा संयम पालना और उत्तम आराधना के साथ अच्छे से अच्छी शासन की प्रभावना करना।

रतन बा का आशीर्वाद लेकर श्री रामविजयजी महाराज वापस उपाश्रय में आए। वरिष्ठ मुनियों ने कहा कि अब तुम्हारा संयम मार्ग निष्कंटक बन गया।

दीक्षा के थोड़े महीने बाद ही श्री रतन बा समाधिपूर्वक स्वर्गवासी बनीं। दीक्षा की अनुमोदना करते उन्होंने देह त्याग किया।