Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

९. दीक्षा हेतु हुआ सृजन

त्रिभुवन पूरे परिवार में सबका प्यारा था। साधु भगवंतों के संपर्क और दादीमां रतन बा द्वारा सिंचित धर्म-संस्कारों की बदौलत त्रिभुवन के मन में दीक्षा लेने की भावना जागृत हुई थी। लेकिन उसकी दादीमां और उसके चाचा उसे दीक्षा लेने से रोक रहे थे। कारण यह था कि तीन भाईयों के बीच यह एक ही पुत्र था। त्रिभुवन के पिता के एक चाचा ने तो यहां तक कहा कि अगर वो दीक्षा न ले तो खुद की दुकान त्रिभुवन के नाम पर कर देंगे। ऐसे प्रलोभन के सामने भी त्रिभुवन अडिग था।

त्रिभुवन के एक मामा ने कहा कि तुम्हें दीक्षा लेनी है तो लेना, लेकिन जब तुम्हारे नये सिलाये कपड़े फट जायें तब। जवाब में त्रिभुवन ने कहा कि लाओ कैंची अभी फाड़ दूं।

त्रिभुवन को समझाने के लिए चाचा ने पादरा के एक वकील को कहा। वकील ने त्रिभुवन को पादरा के एक पारसी न्यायाधीश नानाभाई पेस्तनजी नवसारी वाला के पास ले जाकर दीक्षा नहीं लेने के लिए समझाने की विनती की।

न्यायाधीश ने त्रिभुवन से कहा कि तुम्हें यदि धर्म करना है तो वो क्या संसार में रहकर नहीं हो सकता है? उसके प्रत्युत्तर में त्रिभुवन ने न्यायाधीश से प्रश्न किया कि आप संसार में रहकर कितना धर्म कर पाते हो? त्रिभुवन की दलील के सामने निरुत्तर हुए न्यायाधीश ने कहा कि इस लड़के का सृजन ही दीक्षा लेने के लिए हुआ है।

उन दिनों में गायकवाड़ राज्य में दीक्षा संबंधी कठोर नियम थे। त्रिभुवन के परिजनों ने समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशित करवाई थी कि कोई भी त्रिभुवन को दीक्षा नहीं दे। जो कोई उसे दीक्षा देगा उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन त्रिभुवन तो दीक्षा के निर्णय पर अटल था। हां, किसके पास दीक्षा लेनी है उस पर निर्णय नहीं हुआ था। दूसरी तरफ दीक्षा देने के संबंध में कानूनी चेतावनी के कारण साधु भगवंत भी दुविधा में थे।