१७. दीर्धध्स्ता ज्येष्ठो
पू. रामविजयजी के उत्तराध्ययन के जोग पूरे होने के बाद उन्होंने पू. दानसूरिजी म. को कहा कि मुझे सीधे आचारांग के जोग में बैठाओ। परंतु दानसूरिजी म. ने कहा कि ऐसा नहीं होता। पहले एक बार आघाड़ जोग में से निकलना चाहिए जिससे अनाघाड़ जोग में से निकलना हो तो निकल सके। (आघाड़ जोग में से निकले बिना अनाघाड़ जोग में प्रवेश करे तो अनाघाड़ जोग संपूर्ण करने के बाद ही निकला जा सकता है, नहीं तो अनाघाड़ जोग भी आघाड़ जैसे हो जाते हैं।)। पू. दानसूरिजी के कहने से साहेब उत्तराध्ययन के जोग में से निकलने के बाद ही आचारांग के जोग में बैठे।
जैसे ही आचारांग जोग में बैठे कि एक दिन बाद ही साहेबजी को ‘कुकरखांसी’ हुई, जिस पर दानसूरिजी म. सा. ने कहा कि देखा, यदि सीधे आचारांग जोग में बैठे होते तो क्या होता?
कुकरखांसी होने से साहेबजी को जोग में से निकाला और अच्छे होने के बाद वापस जोग में बैठाया।