Samkit Dayak Vijay Ramchandra Suri

१९. सिर्फ उपस्थिति

दीक्षा और बड़ी दीक्षा को हुए सिर्फ कुछ ही महिने बीते थे, उसके बाद का यह प्रसंग है। रामविजयजी महाराज के एक पूर्व परिचित आचार्य भगवंत ने बड़ौदा में विधवा विवाह के पक्ष में निर्णय लेने हेतु एक सभा बुलाई थी। बड़ी उम्र एवं बड़ा दीक्षा पर्याय होने के बावजूद उन्हें इस निर्णय के विरोध का भय सिर्फ नूतन दीक्षित रामविजयजी महाराज का ही था।

उन्हें आशंका थी कि यदि वे सभा में उपस्थित होते हैं तो उनकी सारी योजना विफल हो सकती है, इसलिए उन्होंने सभा की आमंत्रण पत्रिका में विशेष सूचना लिखायी थी कि सभा में १८ से ३५ वर्ष तक की उम्र के व्यक्ति ही आएं। आमंत्रण पत्रिका हाथ में आते ही रामविजयजी महाराज समझ गए कि मुझे या मेरे गुरुओं को सभा में आने से रोकने हेतु ही यह सूचना लिखी गयी है।

वे गुरुदेवों के पास आये और उन्हें कहा कि सभा में जाने की मेरी इच्छा है, क्योंकि मेरा १८ वर्ष चालू हो गया है, अतः मुझे सभा में प्रवेश करने से कोई रोक नहीं सकता। गुरु आज्ञा प्राप्त होते ही वे सभा के लिए चल दिये। रामविजयजी महाराज को सभा में आते देख वे विचलित हो गये और पूछ बैठे कि किसके आमंत्रण पर आये हो?

रामविजयजी महाराज ने तुरंत उत्तर दिया कि आपके ही आमंत्रण पर आया हूं। मेरा अठारहवां वर्ष प्रारंभ हो गया है।

खुद उम्र का गणित करने में चूक गये इस बात का ध्यान आते ही आचार्यदेव ने नूतन मुनि से पूछा कि प्रवचन दोगे? उन्होंने उत्तर दिया कि वैसे तो सुनने ही आया हूं, फिर भी यदि आपकी इच्छा है तो अंत में थोड़ा बोलूंगा।

यह जवाब सुनकर आचार्यदेव को आघात लगा। खुद की सभी योजनाएं खाक में मिलती देख विधवा विवाह के प्रश्न पर चर्चा किये बिना आधा घंटा दूसरे विषयों पर प्रवचन देकर सभा का विसर्जन किया। इस प्रकार रामविजयजी महाराज की उपस्थिति मात्र से ही प्रस्ताव रुक गया।